गुरू शिष्य बंधन

guru-shishya

कभी उंगली पकड़कर बढ़ाते हैं कामयाबी की ओर कदम, तो कभी कमियाँ बता कर बन जाते हैं क्रिटिक|

कई रूप हैं शिक्षक के, अपने समर्पित रवैये से गुरु तराश देते हैं हीरे और निखार देते हैं चमक|

सीखना ना आता था,

शिष्य होने की कला ना आती थी,

पक्षपात और नकारात्मकता से घिरे थे हम,

फिर हमें गुरू मिले

और फिर शुरू हुआ नवनिर्माण

आपने दिशा दी, विश्वास जगाया

आपने पंख दिये और उड़ने के लिए

उन्मुक्त आकाश

आपने जीवन के हर पहलू को

हँस कर जीना सिखाया |

 

यह कविता  गुरू शिष्य परंपरा के गरिमापूर्ण बंधन को समर्पित है |

यह उन अनगिनत बेनाम लोगों का भी आभार प्रकट करती है जो यूं ही हमे  ट्रेन, बस, लाइब्रेरी में

राह चलते मिल जाते हैं और जाने अनजाने कुछ ना कुछ सिखा जाते हैं |

दीपा द्वारा लिखित

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